1. ‘उसने कहा था’, एक दिव्य प्रेम पर प्राणोत्सर्ग की कहानी है। यह एक युद्ध कहानी भी है। अमृतसर की भीड़ भरी सड़कों पर एक लड़का और एक लड़की दुकान पर मिलते हैं। लड़के ने मुसकुराकर पूछा “तेरी कुड़माई हो गई?’ इस पर लड़की कुछ आँखें चढ़ाकर ‘धत्’ कहकर दौड़ गई और लड़का मुँह देखता रह गया। यहाँ प्रेम के बीज का अंकुरण होता है। दूसरे-तीसरे दिन दोनों फिर मिले। महीना भर यही हाल रहा। कुड़माई (शादी) के बारे में पूछने पर लड़की ने कहा- ‘देखते नहीं यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू’। लड़की भाग गई। लड़के ने घर की राह ली। दूसरे अंक की कहानी में युद्ध का वर्णन आता है। यह प्रथम विश्वयुद्ध का वर्णन है।
खंदकों में बैठे सैनिकों की हड्डियाँ अकड़ गईं तो चटाक से गोली लगती है। युद्ध के मोर्चे पर लहना सिंह, हजारा सिंह और बोधा सिंह तैनात हैं। हजारा सिंह सूबेदारनी का पति है। बोधा सिंह उसका बेटा है। लहना सिंह और सूबेदारनी ही अमृतसर की सड़क पर मिलने वाले लड़का-लड़की हैं। पच्चीस वर्ष बाद की बात है- भारतीय सैनिक अंगरेजों के साथ जर्मनी से लड़ रहे हैं। ठंढक ज्यादा है। हड्डियों में जाड़ा धँस जाता है।
लहना सिंह को बचपन की याद आती है। कुड़माई हो गयी-कहने वाली लड़की आज सूबेदारनी है। वह कहते हैं- मेरा बेटा बोधा सिंह और मेरे पति हजारा सिंह दोनों लाम पर जा रहे हैं।
ये तीनों अंग्रेजी सेना के सिपाही थे। फ्रांस की भूमि पर जर्मनी के विरुद्ध लड़ने के लिए जाते हैं।
वहाँ भीषण ठंढक पड़ रही थी। वर्षा भी हो रही थी। कीचड़ में पैर धँस जाते थे। लहना सिंह युद्ध में लड़ता है। बोधा सिंह को ठंढक लग रही थी। अंगीठी जलाकर वे ठंढक का सामना करते हैं। लहना सिंह, बोधा सिंह के बदले में पहरा दे आता था। बोधा सिंह को लहना सिंह सूखी लकड़ी पर सुलाता था। स्वयं वह कीचड़ में खड़ा रहता था। लहना बुखारग्रस्त बोधा को अपनी जर्सी ओढ़ा देता था।
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इसी समय जर्मन सिपाहियों ने धावा बोल दिया। लहना सिंह ने निशाना साध कर जर्मनों का सफाया कर दिया। लहना सिंह की छाती पसली में एक गोली लगी। लहना सिंह ने साफा बाँधा। वह नहीं होता तो हजारा सिंह, बोधा सिंह सभी मारे गए होते।
दो गाड़ियाँ घायलों को लेने आ पहुँचीं। ‘सूबेदार हजारा सिंह स्वयं घायल थे। पर वह लहना सिंह को छोड़कर नहीं जा रहे थे। लहना ने उसे बताया कि उसका घाव मामूली है। तुम्हें बोधा की कसम कि इस गाड़ी में चले जाओ। उसने गाड़ी पर दोनों पिता-पुत्र को चढ़ाया और कहा कि सूबेदारनी को चिट्ठी लिखोगे तो यह लिख देना कि जो उसने कहा था, वह मैंने कर दिया।’ गाड़ी चली गयी तो लहना लेट गया। उसकी कमर खून से तर हो रही थी। उसने कहा ‘वजीरा पानी पिला’ दे। बचपन की सारी स्मृतियाँ साफ होकर आयीं। लहना सिंह के घाव से लगातार तेजी से खून बह रहा था और खून चल रहा था। सूबेदारनी कह रही थी। लहना सिंह कहता जा रहा था”वजीरा पानी पिला दे, उसने कहा था।’
2. संघर्ष समितियाँ जनता या छात्रों की होंगी।
उनका काम केवल शासन से संघर्ष करना नहीं है, बल्कि उनका काम तो समाज के हर अन्याय और अनीति के विरुद्ध संघर्ष करने का होगा और इस प्रकार से इन समितियों के लिए बराबर एक महत्त्वपूर्ण कार्य रहेगा। गाँव में छोटे अफसरों या कर्मचारियों की चाहे वे पुलिस के हों या अन्य किसी प्रकार के जो घूसखोरी चलती है उसके खिलाफ तो संघर्ष रहेगा ही। साथ-साथ जिन बड़े किसानों ने बेनामी या फर्जी बन्दोबस्तियाँ की हैं, उनका भी विरोध ये समितियाँ करेंगी और उनको दुरुस्त करने के लिए संघर्ष करेंगी। गाँव में तरह-तरह के हो रहे अन्यायों को भी समितियाँ रोकेंगी।
अमेरिका प्रवास के दौरान जे० पी० घोर कम्युनिस्ट थे। वह लेनिन और ट्राटस्की का समय था। 1924 में लेनिन मरे थे। 1924 में ही जे० पी० मार्क्सवादी बने थे। मार्क्सवाद के सभी ग्रंथ उन्होंने पढ़ डाले। रात को एक रशियन टेलर के घर रोज क्लास लेते थे। वहाँ से जब वे लौटे तो घोर कम्युनिस्ट थे। लेकिन वे राष्ट्रहित में अंगरेजों को भगाने के लिए कांग्रेस में शामिल हुए। कम्युनिस्ट होकर भी वे अपने को कांग्रेस से अलग-थलग नहीं रख सके। आजादी की लड़ाई में भाग लेना उन्हें था।
4. अर्द्धनारीश्वर शंकर और पार्वती का कल्पित रूप है, जिसका आधा अंग पुरुष का और आधा अंग नारी का होता है। नर-नारी पूर्ण रूप से समान हैं एवं उनमें से एक के गुण दूसरे के दोष नहीं हो सकते। अर्थात् नरों में नारियों के गुण आएँ तो इससे उनकी मर्यादा हीन नहीं होती बल्कि, उनकी पूर्णता में वृद्धि होती ही होती है।
आज नर है विधाता का मुख्य तंतुवाय जो वस्त्र बुनकर तैयार करता है, नारी का काम उस वस्त्र पर छींटे डालना है। नर है कुदाल चलाने वाला बलशाली किसान जो मिट्टी तोड़कर अन्न उपजाता है, नारी का काम दानों को अछोरना-पछोरना है। कामिनी तो अपने साथ यामिनी की शांति लाती है। नारी की पराधीनता तब आरम्भ हुई जब मानव जाति ने कृषि का आविष्कार किया जिसके चलते नारी घर में और पुरुष बाहर रहने लगा।
आज पुरुष अपनी पत्नी को फूलों का आनन्दमय हार समझता है और प्रत्येक पत्नी अपने पति को बहुत कुछ उसी दृष्टि से देखती है जिस दृष्टि से लता अपने वृक्ष को देखती होगी।
पुरुष जब नारी के गुण लेता है तब वह देवता बन जाता है; किन्तु नारी जब नर के गुण सीखती है तब वह राक्षसी हो जाती है।
जिसे भी पुरुष अपना कर्मक्षेत्र मानता है, वह नारी का भी कर्म क्षेत्र है। नर और नारी के जीवनोद्देश्य एक हैं।
धर्म साधक महात्मा और साधु नारियों से भय खाते थे। विचित्र बात यह है कि इनमें से कई महात्माओं ने ब्याह भी किया फिर नारियों की निंदा भी की। कबीर साहेब ने कहा था- नारी से ब्याह हमने भी किया। उस समय विचार नहीं किया। जब उसे जाना था तब दुःख हरने वाली लगी। अब तो वह महा विकार लग रही है।
दिनकर ने ‘अर्धनारीश्वर’ शीर्षक पाठ में नारी एवं पुरुष को अर्धनारीश्वर कहा है। अर्धनारीश्वर शंकर और पार्वती का कल्पित रूप है, जिसका आधा अंग पुरुष का और आधा अंग नारी का होता है।
दिनकर, रवीन्द्रनाथ, जयशंकर प्रसाद और प्रेमचंद के चिन्तन से असंतुष्ट हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार नारी की सार्थकता उसकी भंगिमा के मोहक और आकर्षक होने में है; केवल पृथ्वी की शोभा, केवल आलोक, केवल प्रेम की प्रतिमा बनने में है। कर्मकीर्ति, वीर्यबल और शिक्षा-दीक्षा लेकर वह क्या करेगी? जयशंकर प्रसाद की इड़ा वह नारी है जिसने पुरुषों के गुण सीखे हैं। प्रसाद जी नारी को पुरुषों के क्षेत्र से अलग रखना चाहते थे। प्रेमचंद का कहना है कि पुरुष जब नारी के गुण लेता है तब वह देवता बन जाता है; किन्तु नारी जब नर के गुण सीखती है तब वह राक्षसी हो जाती है। इस प्रकार दिनकर रवीन्द्रनाथ प्रसाद और प्रेमचंद के चिन्तन से असंतुष्ट हैं। ये तीनों चिन्तक रोमांटिक प्रतीत होते हैं।
5. रोज’ शीर्षक कहानी के कहानीकार हिन्दी के शीर्षस्थ गद्यकार ‘अज्ञेय’ हैं।
अज्ञेय आधुनिक साहित्य की एक प्रमुख प्रतिभा थे। ‘रोज’ अज्ञेय की सर्वाधिक चर्चित कहानी है क्योंकि इसमें ‘संबंधों की
वास्तविकता को एकांत वैयक्तिक अनुभूतियों से अलग ले जाकर सामाजिक संदर्भ में देखा गया है। मध्यवर्ग की पारिवारिक एकरसता को जितनी मार्मिकता से कहानी व्यक्त कर सकी हैं वह इस युग की कहानियों में विरल है।’ मालती दो वर्षों के वैवाहिक जीवन के बाद बदल गयी है। उसे केवल कर्त्तव्यपालन और औपचारिकता निर्वाह करना पड़ता है। उत्साह का सर्वथा अभाव-जीवन में आ जाता है। जीवन नीरस, उदास और यांत्रिक बन गया है। पति महेश्वर अपनी डॉक्टरी में व्यस्त है। उसे रोज ऑपरेशन करना पड़ता है। प्यार दो वर्षों के बाद ठंडा पड़ जाता है। टिटी एक बच्चा है। वह रोज बिस्तर से गिर पड़ता है। पत्नी एक अखबार का टुकड़ा पढ़ती है। वह बाहर की दुनिया से जुड़ना चाहती है। मित्र अतिथि भी औपचारिकता मात्र हो जाते हैं। समासतः ‘रोज’ शीर्षक कहानी में जीवन की नीरसता और यांत्रिकता का
स्वर मुखर हुआ। यह जीवन की नियति है। अज्ञेय एक सफल कहानीकार के रूप में इस कहानी में उभरे हैं। सत्य है- कहानी जीवन से जुड़ी रहती है।